Indian Education System | Education India 2020

Indian Education System vs Finland Education System: शिक्षा हमारे जीवन के लिए कितनी आवश्यक है, ये तो हम सब जानते ही हैं लेकिन क्या आपको पता है? पढ़ाई-लिखाई का तरीका सही होना उससे भी ज्यादा आवश्यक है। 

Indian Education System (इंडिया VS फ़िनलैंड शिक्षा व्यवस्था)

दुनिया में जितने भी देश हैं, उनका अपना एक एजुकेशन सिस्टम होता है। जिसे हम शिक्षा पद्धति या शिक्षा प्रणाली भी कहते है। यही एजुकेशन सिस्टम शिक्षा के गुणवत्ता को निर्धारित करता है। दुनिया में बहुत से ऐसे देश हैं जिनकी शिक्षा व्यवस्था बहुत ही अच्छी है, उनमें से एक देश का नाम है: फ़िनलैंड 

आज हम ये जानने की कोशिश करेंगे कि हमारे देश भारत की शिक्षा व्यवस्था और दुनिया की सबसे अच्छी शिक्षा व्यवस्था में कितना और क्या अंतर है। हमारा देश भारत जिसे हम विश्वगुरु कहते हैं। जो सबसे प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। 

भगवद् गीता जैसे अध्यात्मिक ग्रन्थ के साथ-साथ ना जाने कितने ही ज्ञान के भंडार हमारे देश में भरे पड़े है। इसके बावजूद एक छोटा सा देश जो हमारे सामने ना तो आकार में टिक सकता है ना जनसँख्या में शिक्षा व्यवस्था के मामले में हम उनसे क्यों पिछड़ गये? आखिर ऐसा क्यों है? 

शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में भारत का इतिहास बहुत ही गौरवपूर्ण रहा है। प्राचीन भारत में गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था प्रचलित थी। और चाणक्य के समय में नालंदा विश्वविध्यालय के बारे में कौन नहीं जानता। लेकिन हमारा वर्तमान दुखदायी कहा जा सकता है।

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अभी जो एजुकेशन सिस्टम हमारे देश में चल रहा है, वो दरअसल अंग्रेजो के द्वारा लागू की गई शिक्षा व्यवस्था है। इसे मैकॉले शिक्षा व्यवस्था भी कहा जाता है। जिसे अंग्रेजो ने हमारे देश में सन 1835 में लागू किया था। ताकि यहाँ के युवाओं को अपने फैक्ट्री में क्लर्क और दूसरे काम करने लायक बनाया जा सके।  

वहीं अगर बात करें फ़िनलैंड की तो, सन 1860 तक तो वहाँ पब्लिक एजुकेशन की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। अब तक यहाँ चर्च में ही पढ़ाया जाता था। सन 1866 में चर्च से स्वतंत्र एक नेशनल स्कूल सिस्टम बनाया गया। कोई पीछे ना रह जाये वाली मानसिकता के साथ फ़िनलैंड में एजुकेशन फॉर आल का सिस्टम चलता है।  

मतलब यहाँ शिक्षा सबके लिए सामान और फ्री में उपलब्ध है। स्कूल के बाद कॉलेज की भी पढ़ाई फ्री है। स्कूल में तो पढ़ाई के लिए जरुरी सभी चीजें स्कूल की तरफ से विद्यार्थियों को फ्री में उपलब्ध करवाई जाती हैं। हमारे यहाँ शिक्षा सबके लिए सिर्फ कागजों में उपलब्ध है।  

असल में तो यहाँ भेदभाव से पूर्ण शिक्षा दी जाती है। सरकारी कॉलेज में जाति के हिसाब से सीट मिलती है। और उसके हिसाब से ही एडमिशन दिया जाता है। यहाँ स्टूडेंट ज्यादा और कॉलेज कम हैं। हर साल हजारों स्टूडेंट को एडमिशन सिर्फ इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि अधिकतर कॉलेज में स्टूडेंट्स क्षमता से अधिक होते है। 

और तो और यहाँ किसी नए स्कूल या कॉलेज में प्रवेश पाने के लिए आपके पिछले कक्षा के नंबर और रिजल्ट से भी ज्यादा जरुरी ये होता है की आप किस जाति के हैं। अगर फ्री शिक्षा की बात करें तो कुछ सालों से कुछ राज्यों की सरकार ने सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को फ्री किया है। 

बच्चों को किताबें और यूनिफार्म भी वितरित की जाती हैं। कुछ दशकों से हमारे देश में सरकारी स्कूल के बजाय प्राइवेट स्कूल में पढ़ने का फैशन बना है। सरकारी स्कूल में सरकारी शिक्षकों और सरकारी लचर व्यवस्था के कारण पढ़ाई की हालत औंधे मुँह गिरी पड़ी है। 

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जिसके कारण हर कोई चाहता है की उनके बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़े। यहाँ तक की सरकारी कर्मचारी और सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक खुद अपने बच्चों को अपने सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहते। प्राइवेट स्कूल में दिए जाने वाली सुविधाओं के लुभावने विज्ञापनों से पालक आकर्षित हो जाते हैं। 

दिन रात गधों की तरह जबरदस्ती पढ़ाई करवा के बच्चो को परीक्षा में ज्यादा नंबर लाने पे मजबूर किया जाता है। लेकिन प्राइवेट स्कूल की मोटी फीस होने के कारण हर कोई अपने बच्चे को वहां एडमिशन नहीं दिलवा पाते। अधिकतर प्राइवेट स्कूलों में पैसे वाले घर के बच्चे ही पढ़ते है। 

Finland Education System

दूसरी तरफ फ़िनलैंड है, जहां सारी सुविधाएँ और शिक्षा पूरी तरह फ्री है सरकारी स्कूलो में पढ़ाई की गुणवत्ता इतनी अच्छी है की हर कोई सरकारी स्कूल में ही अपने बच्चे को पढ़ाना चाहता है। बड़े अमीर लोगों से ले के गरीब तक के बच्चे सब एक ही साथ एक ही कक्षा में पढ़ते है।  

हमारे देश में बाल मजदूरी कानूनन अपराध है, फिर भी स्कूलों पर कोई कारवाई क्यों नही होता जो 4-5 साल के बच्चों को 10-10 किलो वजनी बस्ते ढोने पे मजबूर करता है। हमारे यहाँ एक बच्चा जैसे-तैसे तीन साल की उम्र में पहुँचता है और उसे 5-7 किलो वजन के बस्ते के साथ साथ स्कूल भेज दिया जाता है।  

जिस समय बच्चे को खेलने-कूदने और शारीरक विकास होना होता है उस समय यहाँ उसे स्कूल भेज के घंटो-घंटो तक बैठे रहने पे मजबूर किया जाता है। जब तक बच्चा 7 साल की उम्र में पहुँचता है उसकी रचनात्मकता आधी हो जाती है और वो रटने में माहिर होने लगता है।  

वहीं बात अगर फ़िनलैंड की करें तो 7 साल की उम्र से पहले तक किसी भी बच्चे को स्कूल में एडमिशन नहीं दिया जाता। 7 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए डे-केयर और प्री-स्कूल होते हैं, लेकिन वहां पढ़ाई नहीं होती। बल्कि बच्चों को खेलने-कूदने और शारीरिक विकास करने का मौका दिया जाता है।  

साथ ही उन्हें दूसरे बच्चों के साथ रिश्ते बनाना, उनको समझना जैसी चीजें सिखाई जाती है। प्री-स्कूल में भी पढ़ाई नहीं होती बल्कि स्कूल के माहौल के लिए बच्चों को मानसिक रूप से तैयार किया जाता है। ताकि जब बच्चा अपना स्कूल और पढ़ाई शुरू करे तो उसे एक जबरदस्त शुरुआत मिले।  

फ़िनलैंड में लेस इज मोर (कम ही ज्यादा है) के सिद्धांत को मानते है। अर्थात उनके स्कूल में बच्चे हफ्ते में सिर्फ 20 घंटे ही पढ़ाई करते है। मतलब किसी दिन 3 घंटे तो किसी दिन 4 घंटे का ही स्कूल होता है। और इनमे लंच ब्रेक भी शामिल होता है। कोई भी लेक्चर 45 मिनट से ज्यादा का नहीं होता। और हर 45 मिनट के बाद बच्चों को कम से कम 15 मिनट का ब्रेक दिया जाता है।  

कम समय देने का इनका उद्देश्य ये है की बाकि समय में बच्चे खेले-कूदें, सामाजिक गतिविधि में शामिल हो, फैमिली के साथ समय बिताएं, अपने मनपसंद काम करें जैसे की कुकिंग, सिंगिंग, पेंटिंग आदि। इतना ही समय टीचर भी लगाते है पढ़ाने में। एक्स्ट्रा समय में वो लोग आगे के सिलेबस की प्लानिंग करते है और हर हफ्ते कुछ घंटो का उन्हें टीचर ट्रेनिंग लेना होता है।  

अब आप लोग सोच रहे होंगे की इतने कम टाइम का स्कूल होता है तो जरुर होमवर्क बहुत सारा होता होगा। लेकिन आश्चर्य की बात ये है की वहां के स्कूल में होमवर्क का कोई सिस्टम ही नहीं है। जो भी पढ़ना होता है वो स्कूल में पढ़ाया जाता है। हमारे यहाँ एक स्टूडेंट का डेली रूटीन कुछ ऐसा होता है।  

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स्टूडेंट सुबह 5:30 बजे उठता है। फ्रेश होकर ट्यूशन जाता है। 2 सब्जेक्ट ट्यूशन पढ़के वो 9 बजे तक वापस घर आता है। नाश्ता करके 10 बजे स्कूल जाता है। और स्कूल में क्या होता है वो तो आप जानते ही हैं। 4 बजे स्कूल से आता है। फिर ट्यूशन को जाता है। 7 बजे ट्यूशन से आता है।  

1 घंटा होमवर्क करता है। डिनर करता है। फिर 2 घंटा होमवर्क करता है। सो जाता है। अगले दिन फिर रिपीट। फैक्ट्री में मजदूर भी इतनी मेहनत नहीं करते फ़िनलैंड दुनिया का ऐसा देश है जहाँ सबसे कमजोर और सबसे होशियार स्टूडेंट के बीच अंतर सबसे कम है। और फ़िनलैंड इस बात के लिए भी जाना जाता है की वहाँ शायद ही कोई स्टूडेंट फेल होता है।  

वहीं बात अगर भारत की करें तो यहाँ एक ही कक्षा में 2-3 साल तक फेल होने वाले भी मिल जायेंगे और 99% नंबर लाने वाले भी। फ़िनलैंड के स्कूलो में कमजोर स्टूडेंट पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उनको एवरेज स्तर तक लाने के लिए जरुरत पड़े तो उन्हें विशेष कक्षाओं में भी भेजा जाता है।  

हमारे यहाँ कक्षाओं में कमजोर विद्यार्थी को पीछे बैठाया जाता है। और होशियार विद्यार्थियों को आगे। अधिकतर स्कूल और टीचर भी भेदभाव करते है। पढ़ाई में जो आगे होता है उनको पसंद किया जाता है और कमजोर स्टूडेंट को नापसंद किया जाता है। टीचर होशियार स्टूडेंट के पीछे ज्यादा मेहनत करते है और कमजोर को छोड़ देते है।  

पढ़ाई जीवन के दौरान जो सबसे आतंकित करने वाली चीज होती है वो होती है परीक्षा। हर साल हर विषय के लिए परीक्षा। सरकारी स्कूल में साल में कम से कम 3 बार परीक्षाएं होती हैं। प्राइवेट स्कूलों, कॉलेजों, कोचिंग सेण्टर में हर महीने परीक्षा, हर हफ्ते परीक्षा और सरप्राइज टेस्ट के नाम पर कभी भी परीक्षाएं ले ली जाती हैं।  

ऐसा लगता है जैसे हमारे स्कूल सिर्फ परीक्षा लेने के लिए बने हैं। फिर स्टूडेंट को नंबर और ग्रेड दे के उन पे लेबल लगा दिया जाता है। बिना परीक्षा के यहाँ किसी भी क्लास की कल्पना नहीं की जा सकती। यहाँ तक की 3-4 साल के बच्चो की कक्षाएं के.जी. 1 और के.जी. 2 जिसकी कक्षाओं में भी परीक्षाएं ली जाती है. फ़िनलैंड का एजुकेशन सिस्टम बहुत ही ज्यादा चौंकाने वाला है परीक्षा के मामले में। 

क्या आप यकीन करेंगे अगर मैं ये कहूं की फ़िनलैंड के स्कूलों में परीक्षा नहीं लिया जाता। किसी कक्षा में नही। एक भी परीक्षा नहीं। फ़िनलैंड में शिक्षा व्यवस्था ऐसी है की वहां पूरे 9 साल के बेसिक एजुकेशन के दौरान एक भी बार परीक्षा नहीं ली जाती। सीधे हाई स्कूल के बाद मात्र एक ही परीक्षा होता है जो की नेशनल लेवल का होता है और कॉलेज में एडमिशन पाने के लिए ये परीक्षा पास करना जरुरी होता है। 

पहले हमारे संस्कृति में गुरु को भगवान् से भी बढ़के माना जाता था। आज के गुरु वो गुरु नहीं रहे। शिक्षक और शिक्षाकर्मी बन गये है। शिक्षा का स्तर नीचे गिरने में अधिकतर हाथ इन शिक्षक और शिक्षाकर्मियों का भी है। बहुत कम ही शिक्षक हैं जो दिल से शिक्षक बनते हैं। अधिकतर लोग कहीं और नौकरी ना मिलने पर शिक्षक बन जाते है।  

फिर वहां बस अपना ड्यूटी निभाते है। हमारे राज्य में तो शिक्षाकर्मी हर साल स्कूल सत्र के बीच में स्कूल छोड़ के वेतन बढ़ाने और अन्य मांगो को लेकर हड़ताल करतें है। इस दौरान भले ही स्कूल बंद क्यों ना पड़ जाये। प्राइवेट स्कूल में तो शिक्षकों का शोषण होता है। बहुत ही कम वेतन में उनसे काम करवाया जाता है।  

कुल मिलाकर नतीजा ये होता है की टीचर्स दिल से और सही तरीके से नहीं पढ़ाते, शिक्षा का स्तर गिरता है और साथ ही समाज में शिक्षक का सम्मान भी। अगर बात करे फ़िनलैंड की तो, वहां के शिक्षक हमारे शिक्षकों से बहुत अलग होते है। वहां शिक्षक बनना आसान नहीं है।  

सबसे निचली कक्षाओं में भी पढ़ाने के लिए कम से कम मास्टर डिग्री की पढ़ाई आवश्यक है। सके बाद उन्हें उच्च स्तर का प्रशिक्षण दिया जाता है। और हर साल उन्हें ऐसे प्रशिक्षणों में शामिल होना होता है। एक शिक्षक का पेशा यहाँ एक डॉक्टर या इंजिनियर के सामान ही सम्माननीय माना जाता है और, इनका वेतन भी अच्छा होता है।  

फ़िनलैंड में शिक्षा बच्चों को एक अच्छे इन्सान के रूप में तैयार करने के साथ-साथ उन्हें एक अच्छा सामाजिक जीवन जीने के लिए तैयार करना है। चूँकि शिक्षा वहां लोगो का मौलिक अधिकार है और मुफ्त है, पैसों की कमी या अधिकता किसी के शिक्षा को दूसरों के शिक्षा से अच्छा या बुरा नहीं बनाता।  

इसलिए शिक्षा की आड़ में वहाँ कोई बिज़नस या घोटाले नहीं होते। हमारे यहाँ शिक्षा किस तरीके से एक धन्धा और घोटाले करने का तरीका बन गया है वो मैं बताने की कोशिश करता हूँ। यहाँ प्राइवेट स्कूल के बारे में तो सब जानते है वहां अपने बच्चे को पढ़ाते-पढ़ाते एक मध्यम वर्ग के इन्सान की कमर टूट जाती है।  

स्कूल मैनेजमेंट वाले हर साल फीस बढ़ाते है। स्टूडेंट के लिए जितने भी पढ़ाई के सामान चाहिए वो सब स्कूल से ही खरीदना अनिवार्य होता है। चाहे वो किताब हो, नोटबुक, पेन हो, स्कूल बैग के साथ-साथ यूनिफार्म, जूते-मोज़े, टिफ़िन डब्बा तक वहीँ से खरीदना होता है।  

अब कुछ लोग कहेंगे की कहीं से तो खरीदना ही रहेगा इन सामानों को तो स्कूल से ही खरीदने में क्या बुराई है? बुराई ये है की वहाँ मार्किट से ये सामान 3 से 4 गुना ज्यादा महंगा मिलता है। और किसी भी हल में वो आपको लेना ही लेना है। इसके बाद बीच-बीच में अलग-अलग प्रोग्राम करवाने के बहाने, बेवजह टेस्ट के बहाने अलग-अलग बहानों से बच्चों से फीस लिए जाते है।  

स्कूल में कम पढ़ाई करवाए जाते है, या काम चलाऊ ही पढ़ाया जाते है ताकि उन्हें अलग से ट्यूशन देने के नाम पे फिर से पैसे लिए जाते है। और हद तो ये होता है की हर स्टूडेंट को ये ट्यूशन लेने ही होते है। यहाँ बैंक शिक्षा लोन देते हैं ताकि लोग अपनी कॉलेज की पढ़ाई कर सके।  

जो चीजें स्कूल में सिखाया जाना चाहिए वो पढ़ने के लिए करोड़ों के ट्यूशन और कोचिंग का बिज़नस यहाँ चलता है। परीक्षा में पास करवाने के लिए पैसे लिए-दिए जाते है। हमारे यूनिवर्सिटी वालों का तो बहुत ही अलग अंदाज है पैसे कमाने का। पहले एग्जाम होता है तब वो स्टूडेंट को कम नंबर दे देते है। 

फिर पेपर फिर से चेक करवाने या रीकाउंटिंग करवाने के नाम पर एक विषय के लिए 400-500 या 1000 रुपये तक फ़ीस लिया जाता है उसके बाद उन्हें पास कर दिया जाता है सिर्फ इन्हीं रीचेकिंग के काम में ही यूनिवर्सिटी करोड़ों रूपये हर साल कमाते है। और भी ऐसे घोटाले खबरों में आते ही रहते है।  

वैसे तो इनके अलावा और भी बहुत सारी बातें है, जिन्हें गिनाई जा सकती है। लेकिन विडियो की बढ़ती हुई लम्बाई को ध्यान में रखते हुए मैं इस चर्चा को यहीं पर विराम देता हूँ। लेकिन इसका ये मतलब नही है की हमारे देश में हर जगह कमियां है। 

बल्कि यहाँ कई ऐसे शिक्षक और विद्यालय भी है जिनका काम काबिले तारीफ है। परन्तु इनकी संख्या इतनी कम है की वो इस सिस्टम के बीच हमें दिखाई नही देते। इंडिया VS फ़िनलैंड शिक्षा व्यवस्था | Indian Education System vs Finland Education System इस मामले में आपके क्या विचार है, हमें जरुर बताएं

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